Wednesday, 19 October 2011

वो यारों की महफ़िल...

जब भी यादों में पाया उन्हें
ये कदम ठहर से गए...
उन पलों को महसूस करके
ये फिज़ा थम सी गई...
न जाने क्या बात थी
उस यारो की महफ़िल में..
ज़हन में आज भी वो यादें बरक़रार है
खुदमे यु रूठना -मनाना
देर तक यु बातें बनाना..
किसी के दर्द में, अश्क अपनी पलकों से बहाना
कुछ गलती होने पे, गालियाँ देके फिर साथ निभाना..
वो शायद कुछ और ही समां था..
जब ये दिल एक दूजे के लिए धड़कते थे
कल क्या होगा, इससे बेखबर 
बस आज में जिया करते थे...
कल तक जिस दुनिया से बेखबर थे
आज उसी की भीड़ में कहीं खो गए है..
उन तमाम कसमो-वादों के बावजूद
आज फिर भी सबसे दूर हो गए है..
जो पीछे छूट गया है
वो खुदका एक हिस्सा सा लगता है..
अब किसी भी महफ़िल में जाएं
ज़िन्दगी का वो अंश अधूरा सा लगता है..

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