Monday, 17 October 2011

हंसी के वो पल ...

रात की गहराई में 
जब दिल ने खुदको तनहा पाया
कुछ मानो छुट गया हो पीछे
उन तारो ने ये एहसास दिलाया...
बिछड़े कुछ रिश्ते है शायद
हंसी के कुछ पल है शायद...
जिनकी याद से ये आँखे नम हो जाती है
यर रूह थम सी जाती है...
वो पल जो हमने यूँही गवा दिए
कीमत जिनकी बयान न हो सके
रेत समझ हमने यूँही बहा दिए...
वो लब्ज़ कडवाहट के अब चोट पहुचाते है
काश उनमे मोहब्बत के रंग भरे होते..
उस बेरुखी की वजह अब धुन्दला सी गई है
अब वो बेरुखी ही बेवजह सी लगती है...
एक आरज़ू दिल में खटकती है
उन लम्हों को फिर से जीने की...
उन रिश्तो को समेटने की
उस हंसी को कैद करने की...

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